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संगोष्ठियां

'भारत में हानिकारक धातुओं तथा खनिज प्रदूषण - स्रोत, विषाक्तता तथा प्रबंधन' पर पैनल चर्चा
पोषण सुरक्षा पर विचार गोष्ठी
वैज्ञानिक मस्तिष्क के निर्माण पर संगोष्ठी
विज्ञान शिक्षा पर संगोष्ठी
विज्ञान तथा मीडिया पर संगोष्ठी
विज्ञान शिक्षा हेतु प्रयोगात्मक सामग्रियों तथा अधिगम मॉडयूल बनाने पर एशियाई क्षेत्रीय आईएपी संगोष्ठी
विज्ञान शिक्षा पर संगोष्ठी - अकादमियों की भूमिका
21वीं सदी में विज्ञान की दिशाएं - भारतीय तथा फ्रांसिसी परिपेक्ष्य पर संगोष्ठी
विज्ञान में नीतिशास्त्र पर संगोष्ठी
कमी विज्ञान की सीमाओं पर संगोष्ठी
एशियाई क्षेत्रीय आईएपी संगोष्ठी की कार्यवाहियां

पोषण सुरक्षा पर विचार गोष्ठी


दिनांक 3 तथा 4 अगस्त, 2009 को इन्सा सभागार में ''भारत हेतु पोषण सुरक्षा - मुद्‌‌दे तथा आगामी मार्ग'' पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन साम्यता सशक्तिकरण तथा विकास हेतु विज्ञान (सीड), विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी), भारत सरकार की वित्तीय सहायता से किया गया था ।

इस विचार गोष्ठी का उद्‌‌देश्य भारत में कुपोषण के उच्च प्रभाव हेतु उत्तरदायी कारकों, इसके परिणामों, वर्तमान प्रतिउत्तर की जांच करना और आगे के मार्ग की तलाश करना था। प्रो. एम.एस. स्वामीनाथन, एफएनए, एफआरएस, अध्यक्ष, एम.एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन, चैन्नई और संसद सदस्य ने इस विचार गोष्ठी का उदघाटन किया। प्रो. एम. विजयन ने प्रारम्‍भ सत्र की अध्यक्षता की। डा. स्वामीनाथन की चर्चा का विषय - धारणीय पोषण सुरक्षा प्राप्त करना - एक रोड मैप था ।

विज्ञान शिक्षा पर संगोष्ठी


विज्ञान शिक्षा कार्यक्रम - प्रवृत्तियां और भविष्य की पहलें पर एक संगोष्ठी 16-17 मई, 2002 को इन्सा परिसर में आयोजित की गई थी और प्रो. वी.कृष्णन इसके संयोजक थे। संगोष्ठी मुख्‍यतः विज्ञान शिक्षा में अनुभव बांटने, पाठ्‌‌यक्रम, विज्ञान पाठ्‌‌य पुस्तकों में सुधार करने हेतु उत्तरदायी लोगों, शिक्षाविदों, औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनों क्षेत्रों से शिक्षकों; विज्ञान के शिक्षकों के व्यावसायिक विकास हेतु उत्तरदायी होने वालों; विज्ञान शिक्षा में आंकलन में अंतर्ग्रस्त होने वालों और विज्ञान को लोकप्रिय बनाने तथा विज्ञान के प्रसार में इच्छुक होने वालों पर भी केन्द्रित थी। इसमें 39 संगठनों के 65 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया जिन्होंने इस क्षेत्र में अपनी पहलों को पोस्टर, विज्ञान किट तथा पुस्तकों के रूप में प्रदर्शित भी किया था। मोटे तौर पर संगोष्ठी विज्ञान की विभिन्न शाखाओं में विज्ञान शिक्षण (शिक्षण हेतु बल दिए जाने वाले क्षेत्र में बदलाव; शिक्षकों का व्यावसायिक विकास) और विज्ञान विषय-वस्तु ; विज्ञान को लोकप्रिय बनाने तथा उसके प्रसार पर केन्द्रित थी। विचार-विमर्शो को इन्सा द्वारा विज्ञान तथा प्रोद्योगिकी में क्षमता निर्माण पर एक रिपोर्ट के रूप में प्रकाशित किया गया है।

विज्ञान तथा मीडिया पर संगोष्ठी

विज्ञान तथा मीडिया पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन 5 अगस्त, 2002 को किया गया था और इसके संयोजक प्रो. डी.बालासुब्रमण्यम थे। अनुभव साझा करने पर आधारित इस संगोष्ठी ने विज्ञान को लोकप्रिय बनाने तथा उसके प्रसार में नियोजित विज्ञान तथा मीडिया दोनों क्षेत्रों के कई प्रमुख व्यक्तियों को एक मंच पर ला दिया था। संगोष्ठी विज्ञान को लोकप्रिय बनाने हेतु प्रो. डी. बालासुब्रमण्यम को इन्दिरा गांधी पुरस्कार (2002) प्रदान किए जाने से प्रारम्‍भ हुई।

संगोष्ठी 5 सत्रों में विभाजित की गई थी। पहला सत्र जनता के क्षेत्र में जर्नल के प्रकाशन को समर्पित था (डाउन टू अर्थ की सुनीता नारायण; रेसोनेन्स के एन.मुकुन्द और साइन्स रिपोर्टर तथा विज्ञान प्रगति के परविन्दर चावला); दूसरा सत्र लोकप्रिय प्रेस में विज्ञान प्रस्तुत करने पर था (न्यू इंडियन एक्सप्रेस के आर. शंकर और टेरी की सुभद्रा मेनन); ऑडियो-विजुअल मीडिया में विज्ञान के प्रस्तुतिकरण (टर्निंग प्वाइंट के मनमोहन चौधरी) पर था; चौथा सत्र व्यावसायिक प्रेस में भारतीय विज्ञान (नेचर के के.एस.जयरामन, साइन्स के पल्लव बाघला और करेंट साइंस की निरूपा सेन) पर था और अंतिम सत्र भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (एम.एस. जयराजपुरी, उपाध्यक्ष, इन्सा - प्रकाशन / सूचना विज्ञान) के प्रकाशनों से संबंधित था। उपर्युक्त सत्र में से प्रत्येक में काफी विचार-विमर्श किए गए और इससे कई रूचिकर बिन्दु उभरे हैं। समूचे दिवस की कार्यवाहियों को समाप्त करते हुए प्रो. बालासुब्रमण्यिम ने प्रत्येक सत्र में की गई सिफारिशों पर चर्चा की और संगोष्ठी के अंत में निम्नानुसार कार्रवाई बिन्दु सुझाए -

 


डी. बालासुब्रमण्यम
 
  • कार्यशील वैज्ञानिकों और कार्यशील पत्रकारों के मध्य विचार-विमर्श में वृद्धि होनी चाहिए। आर एण्ड डी प्रयोगशालाओं में पत्रकारों हेतु अल्पावधि इन्टर्नशिप से व्यापक रूप से वैज्ञानिक क्रियाकलापों को सराहने में सहायता मिलेगी जो मीडिया में बेहतर कवरेज में परिणत होगा।

  • सटीक विशेषज्ञता के साथ वैज्ञानिकों की सूची पत्रकारों को उपलब्ध करवाई जानी चाहिए ताकि जब कभी भी कोई नई कथा आए तो उस कथा के महत्व तथा सटीकता की जांच हेतु इन वैज्ञानिकों से संपर्क किया जा सके।

  • छात्र समुदाय के मध्य लोकप्रिय विज्ञान व्याख्‍यानों के आयोजन हेतु स्पिक - मैके जैसे स्वैच्छिक संस्थानों को बनाया जाना चाहिए।

  • 'टर्निंग प्वाइंट' जैसे लोकप्रिय विज्ञान कार्यक्रमों को टेलीविजन पर पुनः दिखाया जाना चाहिए। संस्थान समूचे वर्ष ऐसे कार्यक्रमों को चलाने के लिए एक निधि बनाने हेतु पैसा इकट्‌‌ठा कर सकते हैं ।
'भारत में हानिकारक धातुएं तथा खनिज प्रदूषण - स्रोत विषाक्तता और प्रबंधन' पर एक पैनल


दिनांक 30 नवम्बर तथा 01 दिसम्बर, 2010 को भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (इन्सा), नई दिल्ली में ''भारत में हानिकारक धातुएं तथा खनिज प्रदूषण - स्रोत विषाक्तता और प्रबंधन'' पर एक पैनल चर्चा का आयोजन किया गया था।

इस पैनल चर्चा का उद्‌‌देश्य पर्यावरण प्रदूषण हेतु उत्तरदायी होने वाले कारकों की पहचान करना था जो मानव स्वास्थ्य और जैव विविधता पर इसके गम्द्रीर प्रभाव को देखते हुए एक महत्वपूर्ण सामाजिक समस्या है। चूंकि विषय व्यापक है, प्रस्तावित पैनल चर्चा का केन्द्र हानिकारक धातु तथा खनिज अवशिष्टों जैसे कि सीसा, मर्करी, फ्लूराइड तथा आर्सनिक पर था।

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